Thursday, January 23, 2020

मैं ममता हूँ

मैं ममता हूँ
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1.
सन्तानों में अंतः संस्कार  वाहिनी।
वात्सल्य स्नेह शीतल छाया प्रदायिनी।
अलंकार सम हिय में सजती नारी की।
मंजरी हूँ अंतःकरण फुलवारी की।
अंतस मन की भाव-धार में बहती हूँ।
सहनशील हूँ, शोक-ताप भी सहती हूँ।
मैं जगत का मान-मर्यादा क्षमता हूँ।
मैं ममता हूँ।
2.
मैं बँधी हुई हूँ धरती के कण-कण से,
मैं हूँ जुड़ी प्रकृति के विस्तृत प्रांगण से।
राजा हो या रंक सभी मेरे अपने,
मैं ही सँजोती दृगों में स्वर्णिम सपने।
हार-जीत रह-रह स्वीकारा करती हूँ।
आशा घट नित साँझ-सवेरे भरती हूँ।
मैं प्राणी के अंतस की सुंदरता हूँ।
मैं ममता हूँ।
3.
हार-जीत चाहे जिसकी भी होती है,
अश्रु धार मुझको ही सदा भिगोती है।
रचती हूँ नव कथा-कहानी मैं जग में,
स्नेहदीप बनकर जलती हूँ मैं मग में।
रक्त-पात हो मग में या हो स्नेह-मिलन,
शूल-फूल से भर जाता है मेरा तन।
पाँच अँगुलियों में रखती मैं समता हूँ।
मैं ममता हूँ।।
4.
कोख कलंकित जब-जब मेरा होता है।
हृदय पटल मम दर्द भयानक ढोता है।
राम और रावण दोनों की हूँ छाया।
मुझमें ही बसती है दुनिया की माया।
मेरे अपने मुझको सुख-दुख देते हैं।
समय-समय पर अग्नि परीक्षा लेते हैं।
मैं आशा सपना हूँ मगर विवशता हूँ।
मैं ममता हूँ।।

डा.(मानद)ममता बनर्जी "मंजरी"✍
साहित्यकार
गिरिडीह (झारखण्ड)

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