कृपा माँ शारदे कर दो
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न डिग्री है न तमगा है,
न पदवी है न पैमाना।
न पैसे हैं न ताकत है,
न हिम्मत है न अफसाना।
दिया रब ने फ़क़त छोटी,
कलम मेरी हथेली में।
इसे माध्यम बनाकर मैं,
लिखूँ तकदीर का बाना।।
न शब्दों की तिजारत है,
न शिल्पों की नजाकत है।
न विद्या ज्ञान है मुझको,
न औरों की हिमायत है।
जमा पूँजी कहूँ तो बस!
फ़क़त इक नाम है प्यारा।
कहे सब मंजरी मुझमें,
यही रब की इनायत है।।
न छंदों की पकड़ मुझमें,
रसों की तंगहाली है।
न उमड़े भाव हृद तल में,
निहायत हाल माली है।
कृपा माँ शारदे कर दो,
अकिंचन मंजरी पे अब।
खड़ी हूँ द्वार पे कबसे,
लिए अभिलाष झोली है।।
करो उद्धार मुझको माँ,
दया की धार बरसाकर।
लगाओ माँ गले से अब,
जरा मुझपे तरस खाकर।
तड़प मेरी जरा सुन लो,
रहो मत दूर मुझसे तुम।
करो उद्धार मुझको माँ,
बसो हृद गेह में आकर।।
डा.(मानद )ममता बनर्जी "मंजरी"✍
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न डिग्री है न तमगा है,
न पदवी है न पैमाना।
न पैसे हैं न ताकत है,
न हिम्मत है न अफसाना।
दिया रब ने फ़क़त छोटी,
कलम मेरी हथेली में।
इसे माध्यम बनाकर मैं,
लिखूँ तकदीर का बाना।।
न शब्दों की तिजारत है,
न शिल्पों की नजाकत है।
न विद्या ज्ञान है मुझको,
न औरों की हिमायत है।
जमा पूँजी कहूँ तो बस!
फ़क़त इक नाम है प्यारा।
कहे सब मंजरी मुझमें,
यही रब की इनायत है।।
न छंदों की पकड़ मुझमें,
रसों की तंगहाली है।
न उमड़े भाव हृद तल में,
निहायत हाल माली है।
कृपा माँ शारदे कर दो,
अकिंचन मंजरी पे अब।
खड़ी हूँ द्वार पे कबसे,
लिए अभिलाष झोली है।।
करो उद्धार मुझको माँ,
दया की धार बरसाकर।
लगाओ माँ गले से अब,
जरा मुझपे तरस खाकर।
तड़प मेरी जरा सुन लो,
रहो मत दूर मुझसे तुम।
करो उद्धार मुझको माँ,
बसो हृद गेह में आकर।।
डा.(मानद )ममता बनर्जी "मंजरी"✍
