Tuesday, January 28, 2020

विनती

कृपा माँ शारदे कर दो
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न डिग्री है न तमगा है,
न पदवी है न पैमाना।
न पैसे हैं न ताकत है,
न हिम्मत है न अफसाना।
दिया रब ने फ़क़त छोटी,
कलम मेरी हथेली में।
इसे माध्यम बनाकर मैं,
लिखूँ तकदीर का बाना।।

न शब्दों की तिजारत है,
न शिल्पों की नजाकत है।
न विद्या ज्ञान है मुझको,
न औरों की हिमायत है।
जमा पूँजी कहूँ तो बस!
फ़क़त इक नाम है प्यारा।
कहे सब मंजरी मुझमें,
यही रब की इनायत है।।

न छंदों की पकड़ मुझमें,
रसों की तंगहाली है।
न उमड़े भाव हृद तल में,
निहायत हाल माली है।
कृपा माँ शारदे कर दो,
अकिंचन मंजरी पे अब।
खड़ी हूँ द्वार पे कबसे,
लिए अभिलाष झोली है।।

करो उद्धार मुझको माँ,
दया की धार बरसाकर।
लगाओ माँ गले से अब,
जरा मुझपे तरस खाकर।
तड़प मेरी जरा सुन लो,
रहो मत दूर मुझसे तुम।
करो उद्धार मुझको माँ,
बसो हृद गेह में आकर।।

डा.(मानद )ममता बनर्जी "मंजरी"✍

Thursday, January 23, 2020

मैं ममता हूँ

मैं ममता हूँ
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1.
सन्तानों में अंतः संस्कार  वाहिनी।
वात्सल्य स्नेह शीतल छाया प्रदायिनी।
अलंकार सम हिय में सजती नारी की।
मंजरी हूँ अंतःकरण फुलवारी की।
अंतस मन की भाव-धार में बहती हूँ।
सहनशील हूँ, शोक-ताप भी सहती हूँ।
मैं जगत का मान-मर्यादा क्षमता हूँ।
मैं ममता हूँ।
2.
मैं बँधी हुई हूँ धरती के कण-कण से,
मैं हूँ जुड़ी प्रकृति के विस्तृत प्रांगण से।
राजा हो या रंक सभी मेरे अपने,
मैं ही सँजोती दृगों में स्वर्णिम सपने।
हार-जीत रह-रह स्वीकारा करती हूँ।
आशा घट नित साँझ-सवेरे भरती हूँ।
मैं प्राणी के अंतस की सुंदरता हूँ।
मैं ममता हूँ।
3.
हार-जीत चाहे जिसकी भी होती है,
अश्रु धार मुझको ही सदा भिगोती है।
रचती हूँ नव कथा-कहानी मैं जग में,
स्नेहदीप बनकर जलती हूँ मैं मग में।
रक्त-पात हो मग में या हो स्नेह-मिलन,
शूल-फूल से भर जाता है मेरा तन।
पाँच अँगुलियों में रखती मैं समता हूँ।
मैं ममता हूँ।।
4.
कोख कलंकित जब-जब मेरा होता है।
हृदय पटल मम दर्द भयानक ढोता है।
राम और रावण दोनों की हूँ छाया।
मुझमें ही बसती है दुनिया की माया।
मेरे अपने मुझको सुख-दुख देते हैं।
समय-समय पर अग्नि परीक्षा लेते हैं।
मैं आशा सपना हूँ मगर विवशता हूँ।
मैं ममता हूँ।।

डा.(मानद)ममता बनर्जी "मंजरी"✍
साहित्यकार
गिरिडीह (झारखण्ड)
मैं ममता हूँ 
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सन्तानों में अंतः संस्कार  वाहिनी। 
वात्सल्य स्नेह शीतल छाया प्रदायिनी।  
अलंकार सम हिय में सजती नारी की।
मंजरी हूँ अंतःकरण फुलवारी की। 
अंतस मन की भाव-धार में बहती हूँ।
सहनशील हूँ, शोक-ताप भी सहती हूँ।
मैं जगत का मान-मर्यादा क्षमता हूँ। 
मैं ममता हूँ।  

मैं बँधी हुई हूँ धरती के कण-कण से, 
मैं हूँ जुड़ी प्रकृति के विस्तृत प्रांगण से।  
राजा हो या रंक सभी मेरे अपने,  
मैं ही सँजोती दृगों में स्वर्णिम सपने।  
हार-जीत रह-रह स्वीकारा करती हूँ।  
आशा घट नित साँझ-सवेरे भरती हूँ।  
मैं प्राणी के अंतस की सुंदरता हूँ।  
मैं ममता हूँ।।

हार-जीत चाहे जिसकी भी होती है,  
अश्रु धार मुझको ही सदा भिगोती है।  
रचती हूँ नव कथा-कहानी मैं जग में,  
स्नेहदीप बनकर जलती हूँ मैं मग में।  
रक्त-पात हो मग में या हो स्नेह-मिलन,  
शूल-फूल से भर जाता है मेरा तन।  
पाँच अँगुलियों में रखती मैं समता हूँ।  
मैं ममता हूँ।।  

कोख कलंकित जब-जब मेरा होता है।  
हृदय पटल मम दर्द भयानक ढोता है।  
राम और रावण दोनों की हूँ छाया।  
मुझमें ही बसती है दुनिया की माया।  
मेरे अपने मुझको सुख-दुख देते हैं।  
समय-समय पर अग्नि परीक्षा लेते हैं।  
मैं आशा सपना हूँ मगर विवशता हूँ।  
मैं ममता हूँ।।    

-डा.(मानद)ममता बनर्जी "मंजरी"✍